सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण के मामलों में किसानों और भूमि स्वामियों के हक में एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार केवल “खजाने पर बोझ” या “वित्तीय कमी” का बहाना बनाकर किसानों को उनके मुआवजे और ब्याज के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुआवजे के पुराने फैसलों को केवल भविष्य की तारीखों से लागू करने की मांग की गई थी। कोर्ट के इस कड़े रुख से देशभर के उन हजारों किसानों को राहत मिली है जिनकी जमीनें सरकारी परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की गई थीं।
पुराने मामलों में भी मिलेगा लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि यह फैसला पिछली तारीखों से लागू होगा। इसका मतलब यह है कि साल 1997 से 2015 के बीच जिन किसानों की जमीनें अधिग्रहित की गई थीं, उन्हें भी अब उचित मुआवजा और ब्याज मिल सकेगा। कोर्ट ने NHAI की उस दलील को पूरी तरह ठुकरा दिया जिसमें कहा गया था कि पिछली तारीखों से फैसला लागू करने पर सरकारी खजाने पर करीब 29,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। अदालत ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है, चाहे उस पर कितना भी खर्च क्यों न आए।
मुआवजे पर 9% की दर से मिलेगा ब्याज
कोर्ट ने ब्याज की दरों को लेकर भी बड़ी स्पष्टता दी है। अब भूमि स्वामियों को ‘भू-अधिग्रहन अधिनियम’ के अनुसार 9 फीसदी की दर से ब्याज मिलेगा। पहले NHAI एक्ट के तहत इसे 5% तक सीमित करने की कोशिश की गई थी, जिसे कोर्ट ने समानता के अधिकार का उल्लंघन माना है। कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं और समान स्थितियों में लोगों के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
किन्हें मिलेगा इस फैसले का फायदा?
अदालत ने इस लाभ के लिए कुछ समय सीमाएं भी तय की हैं। दरअसल, जिन मामलों में 28 मार्च, 2015 से पहले मुआवजा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। लेकिन, जिन मामलों में इस तारीख तक मुआवजे की प्रक्रिया चल रही थी या विवादित थी, वहां भूमि मालिक अतिरिक्त क्षतिपूर्ति और ब्याज का दावा कर सकते हैं। यदि पूर्व में मुआवजा बढ़ाया गया था लेकिन ब्याज पर फैसला नहीं हुआ था, तो अब उन मामलों में भी ब्याज का लाभ मिलेगा।
