ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की “ऊर्जा धमनी” कहा जाता है, वर्तमान में बड़े संकट से गुजर रहा है। ईरान द्वारा इस समुद्री रास्ते पर नियंत्रण घोषित करने और नाकेबंदी के कारण दुनिया भर की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। इस रास्ते से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल और भारी मात्रा में एलएनजी (LNG) का परिवहन होता है, जो वैश्विक आपूर्ति का पांचवां हिस्सा है। युद्ध और तनाव के चलते यहाँ से गुजरने वाले जहाजों की संख्या 138 से घटकर मात्र 8 रह गई है। अगर यह रुकावट लंबे समय तक जारी रही, तो न केवल तेल की कीमतें आसमान छुएंगी, बल्कि उर्वरक और खाद्य सामग्री की कमी से पूरी दुनिया में हाहाकार मच सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर बहुत अधिक निर्भर है। लगभग 74 अरब डॉलर का भारतीय व्यापार इसी रास्ते से होता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि एलपीजी से लदे दो भारतीय पोत ‘पाइन गैस’ और ‘जग वसंत’ होर्मुज पार कर चुके हैं और जल्द ही कांडला व मंगलुरु बंदरगाह पहुँचने वाले हैं। लेकिन भविष्य में होने वाली देरी भारत में गैस और तेल की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
दुनिया की खेती और खाद पर संकट
होर्मुज का रास्ता सिर्फ ईंधन के लिए ही नहीं, बल्कि उर्वरक (Fertilizer) की आपूर्ति के लिए भी महत्वपूर्ण है। खाड़ी देश दुनिया का 10% उर्वरक बनाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 56 दिनों तक बंदरगाहों पर जाम और जहाजों की आवाजाही ठप रही, तो दुनिया भर में सामान पहुँचाने वाली पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है, जिससे खेती और खाद्य सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा होगा।
विकल्पों का अभाव और बढ़ती चुनौती
खाड़ी देशों के पास अपना तेल और गैस बाहर भेजने के लिए होर्मुज के अलावा कोई दूसरा मजबूत समुद्री विकल्प मौजूद नहीं है। कंप्यूटर मॉडल के जरिए वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि चार हफ्तों से ज्यादा की रुकावट वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को पूरी तरह तोड़ देगी। फिलहाल सैकड़ों जहाज खाड़ी के अंदर फंसे हुए हैं, जिससे ऊर्जा व्यापार को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
