कुमाऊं शराब नीति कांड: नेता जी के चहेते की वसूली रुकी, तो सोशल मीडिया पर सियासी हमला

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कुमाऊं में क्या नेता जी के चहेते की कमाई पर लग गया विराम…? शराब नीति पर सियासी संग्राम, वसूली के आरोपों ने बढ़ाई हलचल…

राज्य की राजनीति में शराब नीति को लेकर हलचल पैदा करने को लेकर अब सवाल उठ रहे है । दरअसल कुमाऊं मंडल से सामने आ रही चर्चाओं ने न केवल राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी बढ़ा दी है, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि कल तक देसी शराब के कारोबारियों से प्रति पेटी 20 से 50 रुपये तक की कथित वसूली करने वाला एक नेता का चहेता अब अचानक सक्रिय होकर सोशल मीडिया पर अपने आका के माध्यम से शराब नीति के खिलाफ मुखर हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने कई तरह के संदेह और सवाल पैदा कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर दबी जुबान में यह चर्चा तेज है कि जिस व्यक्ति के नाम पर वसूली की चर्चाएं हो रही थी, वह किसी प्रभावशाली राजनीतिक नेता के करीबी के तौर पर जाना जाता रहा है। ऐसे में अब जब उस कथित वसूली पर अंकुश लगने की बात सामने आई है, तो उसी नेटवर्क से जुड़े लोगों द्वारा सोशल मीडिया के जरिए सरकार की शराब नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो कुमाऊं क्षेत्र में लंबे समय से देसी शराब के कारोबार में अनौपचारिक वसूली की शिकायतें मिलती रही है। हालांकि इस पर कभी खुलकर कार्रवाई नहीं हो पाई। लेकिन हाल के दिनों में प्रशासन की सख्ती बढ़ने और निगरानी तंत्र मजबूत होने के बाद ऐसे मामलों पर रोक लगने की खबरें सामने आई हैं। इसी के बाद से राजनीतिक चेहरों की बेचैनी बढ़ी हुई बताई जा रही है।

सोशल मीडिया पर लगातार की जा रही पोस्टों में शराब नीति को जनविरोधी बताते हुए सरकार पर निशाना साधा जा रहा है। हालांकि इन पोस्टों की टाइमिंग और पीछे की मंशा को लेकर राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि नीति में खामियां हैं तो उसका विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यदि विरोध के पीछे व्यक्तिगत हित या आर्थिक नुकसान की भरपाई का प्रयास हो, तो यह गंभीर विषय बन जाता है।

विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए पारदर्शिता की मांग की है। उनका कहना है कि यदि वसूली के आरोप सही हैं तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का मानना है कि यह पूरा मामला बेवजह तूल दिया जा रहा है और कुछ लोग अपनी साख बचाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं।

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाती है और क्या वसूली के आरोपों की कोई आधिकारिक जांच शुरू होती है या नहीं।