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उत्तराखंड फायर सीजन: सीजन की शुरुआत में ही 42% वन हुए खाक, कम बारिश से बढ़ा वनाग्नि का खतरा

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उत्तराखंड में आधिकारिक फायर सीजन शुरू होते ही 42 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। पहले दो दिनों में 80 से अधिक फायर अलर्ट मिले। सर्दियों में कम बारिश के कारण जंगलों में नमी कम है, जिससे आग का खतरा बढ़ गया है। वन विभाग के लिए मानसून तक जंगलों को आग से बचाना बड़ी चुनौती है, हालांकि विभाग तैयारी का दावा कर रहा है।

उत्तराखंड में 15 फरवरी से आधिकारिक फायर सीजन की शुरुआत हो चुकी है। दरअसल, प्रदेश में हर साल 15 फरवरी से 15 जून तक के समय काल को फायर सीजन माना जाता है, क्योंकि बढ़ती गर्मी के साथ जंगलों में वनाग्नि की घटनाओं में भी बढ़ोतरी होती है। 2026 में फायर सीजन की शुरुआत हुए मात्र दो दिन ही बीते हैं लेकिन वन विभाग को इन बीते दो दिनों में ही 80 से अधिक स्थानों पर वनाग्नि की घटनाओं की खबरें प्राप्त हुई हैं। हैरत की बात यह है कि साल 2026 में फायर सीजन की शुरुआत तक ही राज्य के 42 हेक्टेयर वन जलकर खाक हो चुके हैं। अब वन विभाग के समक्ष मानसून तक जंगलों की वनाग्नि से रक्षा करना सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

नवंबर से 1957 अलर्ट, सिर्फ 6% सही पाए गए

उत्तराखंड के लिए वनाग्नि के लिहाज से साल 2024 बेहद बदतर साबित हुआ, क्योंकि साल 2024 में वनाग्नि के मामले में उत्तराखंड पहले पायदान में आ गया था। इसके बाद वनाग्नि रोकने के लिए कई कदम उठाए गए। लेकिन, अब भी वनाग्नि विभाग के लिए बड़ी चुनौती है।

उत्तराखंड में इस शीतकाल के दौरान कम बारिश और बर्फबारी के कारण जंगलों में नमी कम हो चुकी है, वहीं वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2025 से लेकर वर्तमान समय तक राज्य के 54 स्थानों पर वनाग्नि की घटनाएं हो चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि मात्र इतनी ही घटनाओं से प्रदेश के 42 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो चुके हैं। वहीं नवंबर 2025 से लेकर जनवरी 2026 के मध्य तक वन विभाग को प्रदेशभर में वनाग्नि के 1957 फायर अलर्ट मिले हैं, हालांकि, विभाग अधिकतर अलर्ट को गलत मानता है। विभाग का कहना है कि मौके पर मात्र132 (6.75 प्रतिशत) वनाग्नि के अलर्ट ही सही पाए गए।

विशेषज्ञ सुझावों पर कब अमल करेगा वन विभाग?

उत्तराखंड में हर साल लाखों हेक्टेयर जंगल वनाग्नि की चपेट में आ जाते हैं, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पर्यावरणविद अजय रावत जैसे विशेषज्ञों ने ठोस सुझाव दिए हैं, जिनमें होटल-रिजॉर्ट में बोन फायर व कैंप फायर पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना, वनाग्नि को राष्ट्रीय आपदा नीति में शामिल करना शामिल है। उन्होंने वन रेंजर से ऊपर के अधिकारियों द्वारा निरंतर निगरानी, फायर वाचटावरों को समय पर सम्मानजनक मानदेय, डीएफओ द्वारा हर कंपार्टमेंट की डायरी रखना और ग्रामीणों के साथ जनचेतना बढ़ाने पर जोर दिया है।

ये कदम मानवीय लापरवाही व चिंगारी से होने वाली आग पर लगाम लगा सकते हैं। फिर भी वन विभाग इन सुझावों को लागू करने में देरी बरत रहा है, जबकि पिरुल भरी वादियां आग के उच्च जोखिम में हैं। समय रहते अमल न हुआ तो अगला फायर सीजन भयावह होगा। सरकार को तत्काल नीतिगत फैसला लेना चाहिए ताकि जंगलों का संरक्षण हो और जैव विविधता बचे।