देहरादून में शराब के ठेके अब सिर्फ बिक्री के केंद्र नहीं बचे, बल्कि धीरे‑धीरे सियासी सक्रियता और कथित ‘धन उगाही’ के नए अड्डे बनते जा रहे हैं। हालात यह हैं कि ठेके का शटर उठने से पहले ही नेताओं की मौजूदगी साफ इशारा करती है कि जनहित से ज्यादा किसी और मकसद में दिलचस्पी है।
इन दिनों शहर में चर्चा है कि शराब की दुकानें अब कुछ नेताओं के लिए राजनीति की पहली सीढ़ी बन गई हैं और असली मुद्दों की कमी के बीच जनहित को पीछे छोड़कर ठेकों के सहारे अपनी सियासी जमीन बनाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। विरोध प्रदर्शन के नाम पर भीड़ जुटाने से लेकर माहौल बनाने तक, हर कदम में रणनीति से ज्यादा ‘समीकरण’ दिखाई दे रहे हैं।
इस बीच सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक ऑडियो सवालों को और गहरा कर रहा है। ऑडियो में एक महिला कथित तौर पर हर घर से 500 रुपये एकत्र करने की अपील कर रही है, ताकि आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सके। अब सवाल गहराता है कि यह आंदोलन क्या सच में जनहित का नाम लेकर चल रहा है या फिर किसी खास मकसद से पैसा जमा कर दबाव बनाने का जरिया बन रहा है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि विरोध की आड़ में जो कुछ चल रहा है, वह पारदर्शिता से बहुत दूर लगता है। अगर आंदोलन वाकई जनभावनाओं से जुड़ा है, तो फिर फंड‑कलेक्शन की जरूरत क्यों पैदा हो रही है और उसका वास्तविक उपयोग किस रूप में होगा? यही सवाल पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है।
वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि शराब की दुकानें सरकार के लिए एक बड़ा राजस्व का स्रोत हैं। इसी राजस्व के दम पर सड़क‑बिजली, पानी, दवा और अस्पताल जैसे विकास कार्य चलते हैं और सरकारी योजनाएं गति पकड़ती हैं। ऐसे में ठेकों को लेकर हो रही राजनीति, विकास बनाम विरोध की बहस को भी पैदा कर रही है।
फिलहाल देहरादून में शराब के ठेकों के आसपास जो सियासी हलचल दिखाई दे रही है, उसने एक नई बहस तो जरूर छेड़ दी है—क्या यह सच में जनता की आवाज है या फिर ‘विरोध’ के नाम पर चल रहा कोई और गेम?
