देहरादून। शराब कारोबार और विवाद का रिश्ता कोई नया नहीं है, लेकिन जब कोई कारोबारी चुनावी माहौल से ठीक पहले अपने ही कारोबार और उससे जुड़े सरकारी सिस्टम पर सवाल उठाने लगे तो चर्चाओं का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है। इन दिनों शराब कारोबारी दिनेश मल्होत्रा भी सोशल मीडिया पर सामने आए एक इंटरव्यू को लेकर चर्चा में हैं। इंटरव्यू के बाद उनके बयान को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं और अब आबकारी विभाग भी उनके पुराने विवादों की फाइलों को खंगालने में जुटा नजर आ रहा है।
सोशल मीडिया पर सामने आए इंटरव्यू में विभाग को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश दिखाई दी, तो दूसरी तरफ विभाग से जुड़े लोगों ने भी कारोबारी से जुड़े पुराने मामलों और विवादों का हवाला देना शुरू कर दिया। यानी मामला अब सिर्फ शराब की दुकान या कारोबार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया बनाम सरकारी रिकॉर्ड की लड़ाई जैसा रूप लेता दिखाई दे रहा है।
सबसे ज्यादा चर्चा उस पुराने मामले की है, जिसमें एक महिला अधिकारी के साथ कथित दुर्व्यवहार और दुकान में आग लगाए जाने से जुड़ा मामला सामने आया था। यह प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन बताया जाता है, इसलिए इसमें अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले के बाद ही माना जा सकता है। लेकिन यही पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा में आने से सवाल जरूर उठ रहा है कि कारोबार से जुड़े विवाद जब अदालत और विभागीय रिकॉर्ड में मौजूद हों, तो सोशल मीडिया पर उनकी एकतरफा व्याख्या कितनी उचित है?
आबकारी विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यह पहला मौका नहीं है जब कारोबारी से जुड़े विवाद सामने आए हों। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन विभाग अब कथित तौर पर पूरे मामले को रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर देखने की तैयारी में है। दिलचस्प बात यह है कि चुनावी माहौल में शराब का कारोबार सिर्फ बोतलों तक सीमित नहीं रहता—कभी राजनीति से जुड़ जाता है, कभी सिस्टम से और कभी सोशल मीडिया से। सरकारी स्तर पर जीरो टॉलरेंस की नीति और विभागीय जवाबदेही पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे में अधिकारियों के सामने चुनौती भी साफ है—न किसी कारोबारी के दबाव में आना और न सोशल मीडिया के शोर में रिकॉर्ड से हटकर कार्रवाई करना। क्योंकि आखिरकार सोशल मीडिया पर इंटरव्यू कितने भी वायरल हो जाएं, सरकारी कार्रवाई का आधार वीडियो की लोकप्रियता नहीं बल्कि कानून, रिकॉर्ड और जांच ही होती है।
अब देखना यह होगा कि इस पूरे विवाद में आगे कौन-सी फाइल खुलती है और कौन-सा दावा रिकॉर्ड की कसौटी पर खरा उतरता है। फिलहाल इतना जरूर है कि शराब कारोबार का यह विवाद अब दुकान की चारदीवारी से निकलकर सोशल मीडिया की स्क्रीन तक पहुंच चुका है—और चुनावी मौसम में इसकी राजनीतिक चर्चा होना भी तय माना जा रहा है।
